Sunday, April 12, 2020

महानायक अमिताभ बच्चन की कविताएं – Amitabh Bachchan Poems in Hindi। afactshindi


महानायक अमिताभ बच्चन की कविताएं - Amitabh Bachchan poems in hindi


Amitabh bachchan poems in hindi

हमारा दर्शन

थोड़ी-बहुत सम्पत्ति अरजने में कोई बुराई नहीं
बेईमानी से एक फ़ासला बनाकर जीना सम्भव है
ईमानदारी के पैसे से घर बनाया जा सकता है
चोर-डाकू सुधर सकते हैं
किराएदारों को उदार मकान-मालिक मिल सकते हैं
ख़रीदार दिमाग ठण्डा रख सकता है
विक्रेता हर पल मुस्कुराते रहने की कला सीख सकता है
ग़रीब अपना ईमान बचा सकते हैं
जीने का उत्साह बनाए रखना असम्भव नहीं
लोगों से प्यार करना मुमकिन है
बारिश से परेशान न होना सिर्फ़ इच्छा-शक्ति की बात है
ख़ुश और सन्तुष्ट रहने के सारे उपाय बेकार नहीं हुए हैं
लोग मृत्यु के डर पर काबू पाने में सक्षम हैं
पैसे वाले पैसे के ग़ुलाम न बनने की तरक़ीब सीख सकते हैं
कारोबार की व्यस्तताओं के बीच एक अमीर का प्रेम फल-फूल सकता है
समझौतों के सारे रास्ते बन्द नहीं हुए
बेगानों से दोस्ती की सम्भावनाएँ ख़त्म नहीं हुई
बच्चों और नौकरों को अनुशासन मे रखने के उपायों का कोई अन्त नहीं
चूतड़ के बिना भी आदमी बैठ सकता है
निरन्तर युद्ध की स्थिति में भी दुनिया बची रह सकती है


जिन्हे प्रेम नसीब नहीं हुआ 

जिन्हें प्रेम नसीब नहीं हुआ
उन्हें रसायनशास्त्र से प्रेम नहीं हुआ
उनके हाथ लगा रसायनशास्त्र
जैसे जीवशास्त्र पढ़ते हुए
किसी को बैंक किसी को सेना हाथ लगे

उन्हें प्रेम नहीं हुआ
वह स्वयं
एक ज़िम्मेदार, अनुशासित औरत के
हाथ लगे

दोनों को फाटक वाला घर
सुरक्षा की चिन्ता
हाथ लगी

जिस दिन
रसायनशास्त्र खो गया
बचा सिर्फ़ चाबियों का एक बड़ा-सा गुच्छा
कुछ फ़ौलादी ताले
चोरों का डर

उन्हें प्रेम नहीं हुआ
सुरक्षा की सुरक्षा करते हुए
उन्होंने अन्तिम साँस ली

वे फुदकते रहे
घर के अन्दर
जैसे पिंजरे में तोता

उनके आकाश में
चील-बाजों का आतंक था

वे पूछते कौन
आवाज़ पर यकीन नहीं करते
आदमी के मुँह पर टॉर्च जलाते
कोई ख़तरा न देख
मेहमानों को
घर के अन्दर ले लेते

उन्होंने दो-एक ज़रूरी यात्राएँ की
हालाँकि अजनबियों से फ़ासला बनाकर रखा
किसी का कुछ नहीं चखा
घर से ही पानी ले गए

कभी किसी पर उनका दिल नहीं आया
पर वे मुस्कुराए
हँसे भी
खतरों का सामना करने के लिए
बिना प्रेम के
पचासी साल तक
वे रोटियाँ निगलते और पचाते रहे

प्रेमियों को
वे पसन्द नहीं कर पाए

प्रेमियों को
उन्होंने बड़े ख़ौफ़नाक तरीके से
नफ़रत करते हुए देखा

बारूद और तूफ़ान से भी ज़्यादा
वे प्रेम से डरते

जिनका मकान नहीं बना
जिन्हें औरत छोड़कर चली गई
जो खुले में हिरण जैसा दौड़ते
जो आवारा घूमते
जिन्होंने शराब से किडनी ख़राब कर ली
जो आधी रात तारों को निहारते
आदमियों का बखान तीर्थस्थल की तरह करते
मौत की तारीख़ याद नहीं रखते
फाटक खुला छोड़कर निकल जाते
उन्हें वे बहुत दूर से
और किसी बड़ी मज़बूरी में ही
हाथ जोड़कर नमस्कार करते

तरह तरह के हिन्दू

सारे हिन्दू हिन्दू नहीं होते
जो हिन्दू नहीं होते
वे भी हिन्दू होते हैं
क्योंकि वे मुसलमान नहीं होते
लंगोट बाँधने,
राख लपेटने वाले
हिन्दुओं में भी
कुछ कम कुछ ज़्यादा हिन्दू होते हैं
एक खद्दरधारी गांधीवादी
कब खतरनाक हिन्दू में बदल जाए
क्या पता

गरम होता नरम हिन्दू
नरम पड़ता गरम हिन्दू
जनवादी हिन्दू
कम्युनिस्ट हिन्दू
मुक्त हिन्दू उन्मुक्त हिन्दू
जीवन के आख़िरी वक़्त में जगा हिन्दू
अछूत हिन्दू सवर्ण हिन्दू
गँवार हिन्दू सुसंस्कृत हिन्दू
दलितों के हिन्दू बने रहने की अपील करता हिन्दू
भ्रष्ट, अवसरवादी, धर्मनिरपेक्ष हिन्दू
टीक रखने और ठोप लगाने वाला हिन्दू
दिमाग ठण्डा रखने के लिए
माथे पर चन्दन लगाने वाला हिन्दू
भेदिया, प्रचारक, शूटर हिन्दू
संहार करने वाला हिन्दू
संहार देखता हिन्दू
अपने हिन्दू होने पर सुरक्षित महसूस करता हिन्दू
मुस्लिम लड़की के इश्क़ में गिरफ़्तार हिन्दू
उग्र हिन्दुओं से सम्पर्क वाला हिन्दू
जन्म से हिन्दू
सिर्फ़ नाम का हिन्दू
ख़ुद को हिन्दू बताने में शरमाता हिन्दू
झूठा हिन्दू सच्चा हिन्दू
मुसलमानों का डर समझने वाला हिन्दू
मुसलमानों को कसाई समझने वाला हिन्दू
क्या हिन्दुओं की ये अवास्तविक श्रेणियाँ हैं
नहीं, हिन्दू तरह-तरह के होते हैं
और यक़ीन मानिए
उतने ही तरह के मुसलमान भी होते हैं

मैं बचपन से चोर था

मैं बचपन से चोर था
चोर ही रहा जीवन भर
जेब से पैसे चुराए
पेड़ से आम नींबू
बहती नाव से तरबूजे
पानी से छोटी मछलियाँ
क़िताबों से कविताएँ

डाकू न बन सका
गिरोह नहीं बनाए
सच्चे कायरों की तरह
आदमी और कवि
दोनों रोए पछताए

महान बनने का भूत 

महान बनने का भूत
मुझे दीमक-सा चाट गया
मेरे सोए कवि को
जहरीले साँप-सा काट गया
मोची से उसके बक्से पर बैठ
बतियाने में
लड़की को छेड़छाड़ से बचाने में
दोस्तों को जुआ खेलने से हड़काने में
भंग खाकर ठिठियाने में
सूट्टे लगाने में
जैसे तैसे दिल्ली आ जाने में
मरने के बाद पिता की डायरी को
आविष्कारक की तरह पढ़ने में
दो एक बार माँ का इलाज कराने में
लोभ लालच और अपनी नीच हरकतों से
कभी कभार झटका खा जाने में
पण्डे-पुरोहितों से लड़ जाने में
बीड़ी-खैनी खाकर रात भर जग जाने में
मरे हुए कुछ दार्शनिकों को
मन ही मन
दोस्त दुश्मन और शागिर्द बनाने में
इधर उधर दो चार कविता छपाने में
निकल गई मेरी सारी महानता
फुस्स हो गई कविता

मेरे पिता को कभी किसी द्वंद्व ने नहीं घेरा

मेरे पिता को कभी किसी द्वंद्व ने नहीं घेरा
जैसे कि पहले नहा लूँ या पहले खा लूँ
घूस लूँ या न लूँ
होली में गाँव जाऊँ या न जाऊँ
खाने के बीच पानी पीऊँ या नहीं
खद्दर पहनना छोड़ दूँ या पहनता रहूँ
पहले बिना माँ-बाप की भतीजी का ब्याह करूँ
या साइकिल खरीदूँ
दो दिन पहन चुका कपड़ा तीसरे दिन भी पहन लूँ या नहीं पहनूँ
शाम में खुले आकाश के नीचे बैठूँ या न बैठूँ
कुर्सी ख़ुद उठा लाऊँ या किसी से मँगवा लूँ
पड़ोस में अपनी ही जात वालों को बसाऊँ या न बसाऊँ
डायरी लिखता रहूँ या छोड़ दूँ
भिण्डी पाँच रूपए सेर है
डायरी में दर्ज करूँ न करूँ
गर्भ-निरोध का आपरेशन करवा लूँ या रहने दूँ
संशय से परे
उन्होंने कुछ अच्छा किया, कुछ बुरा
मैं सिर्फ संशयों में घिरा रहा
कवि मौन मुझे देखता रहा, देखता रहा

मैं दस साल का था

मैं दस साल का था
तो सौ बच्चों के साथ खेलता-कूदता था
भागता-दौड़ता लुकता-छुपता था
बीस साल का हुआ
तो दस में सिमट गई मेरी टोली
कुछ मुझे मतलबी दिखते
कुछ को मैं आत्मग्रस्त दिखता
चालीस के आसपास
जिन चार-पाँच से मैं घिरा रहता
वे मेरे ख़ून के प्यासे नज़र आते
कभी वे मेरी, कभी हम उनकी
गर्दन दबाते
अब सत्तावन का हो गया हूँ
सबसे बिछड़ गया हूँ
कोई इंसान नहीं
कुछ चीज़ें हैं मेरे पास
अब उन्हीं की है आस
मुझे भी और उन्हें भी
जो आएँगे शायद
मरने पर
मुझे जलाने

मुझे ईर्ष्या है महानायकों से

मुझे ईर्ष्या है महानायकों से
उनकी तरह मैं मजबूत घोड़ा
ताक़तवर खच्चर नहीं बन सका
जो उतार-चढ़ाव से नहीं घबराते
सारा कूड़ा-करकट
पीठ पर लाद हिनहिनाते भागते
सबकी नैया पार लगाते
टूटते सितारों को कन्धा देते
मुझे दुख है मैं महानायक भी नहीं बना ।

विडम्बनाओं के बारे में

विडम्बनाओं के बारे में
मेरी बुनियादी समझ साफ़ थी
क़लम को सब पहले से पता होता
थोड़ा ख़ुद को कोसता
थोड़ा अपने जैसों को
कुछ उलाहना समाज सरकार को देता
कुछ ग़रीबों को गरियाता
थोड़ा पुलिस माफ़िया पर गरज़ता
फिर आदमी के जीने के हौसले को याद करता
फिर लोकतन्त्र में सुधार के लिए शोर मचाता
फिर दफ़्तर से बाहर निकल पान चबाता
और सहकर्मियों से कहता
इससे अधिक हम क्या कर सकते हैं
कवि को ये ढर्रा रास न आता

मांगने वालों का गीत 

माँगने में कोई बुराई नहीं
आदमी को माँगना चाहिए
पूरी ताक़त से माँगना चाहिए
मिल-जुल कर माँगना चाहिए
माँगने में शर्माना नहीं चाहिए
माँगते समय
गिरने का भाव नहीं आना चाहिए
ज़्यादा से ज़्यादा माँग लेना चाहिए
कि बाद में नहीं माँगने केलिए पछताना न पड़े
पैसा, मकान, ज़मीन
काम
सड़क
पानी
रोशनी
क़िताबें
खेल का मैदान
छुट्टी
यात्राएँ
दफ़न होने की जगह
सब माँगना चाहिए
भरपूर माँगना चाहिए
हक समझ कर माँगना चाहिए
सहायता पाने की तरह नहीं माँगना चाहिए
नहीं मिलने की उम्मीद हो
फिर भी माँगना चाहिए
डट कर माँगने में
मारे जाने का खतरा हो
फिर भी माँग कर आजमाना चाहिए
माँगने में कोई बुराई नहीं
लेकिन
माँगने वालों
तुम्हें यह भूलना नहीं चाहिए
सिर्फ माँगते रहोगे
तो देने वाले बचे रहेंगे
देने में डण्डी मारेंगे
कम देंगे और ज़्यादा देने पर अँगूठा लगवाएँगे
देकर छीनते रहेंगे

माँगने की रिवायत
का अन्त करने के लिए
माँगते रहना
काफ़ी नहीं

माँगने की रिवायत
का अन्त करने के लिए
देने वालों का वजूद
मिटाना पड़ेगा

देने वालों का वजूद
माँगकर
नहीं मिटाया जा सकता

हम उनके लिए माँगते हैं
जिनके पास कुछ नहीं है
हम सुदूर इलाकों में जाकर
उनका पता लगाते हैं
हम उन्हें समझाते हैं
माँगने से क्या नहीं मिलता
हम उन्हें आहिस्ता-आहिस्ता
माँगने में समर्थ बनाते हैं
जलील होकर भी माँगना सिखाते हैं

माँगने की कला में महारत हासिल करने के बाद
हमने ये जाना है
कि देने वाला माँगने की तमीज सिखाए बगैर
कभी कुछ नहीं देता

माँगने का हमने बहुत बड़ा तन्त्र खड़ा किया है
हमारे जैसे चुस्त और ठोक-बजाकर माँगने वाले
बहुत कम हैं
देने वालों के बीच हम जैसा लोकप्रिय कोई नहीं
हम अब भिखारी नहीं रहे
देने वाले हमारे दरवाज़े पर आते हैं
हमारा माँगना आन्दोलन बन चुका है

माँगना हमारा पेशा है
माँगने की हम जबर्दस्त तैयारी करते हैं
माँगने के औचित्य पर निरन्तर हमारा विमर्श चलता है
देने वाले की हर कमज़ोर नब्ज़ हम जानते हैं
मजाल है कि हम माँगें
और देने वाला मना कर दे

सच पूछिए तो हमारा माँगना एक नाटक है
दरअसल हम देने वालों के साथ हैं
हम देने और लेने वालों के बीच
हिंसा और ख़ून-ख़राबा नहीं चाहते
देने वालों की सहुलियत के लिए
हम माँगने की परम्परा कायम रखना चाहते हैं

ये जो तुम दे रहे हो
दरअसल ये है किसका
तुम्हारे पास ये आया कहाँ से
देने वालों से ये पूछ कर
हम अपना धन्धा चौपट नहीं कर सकते
हमारा बुनियादी काम माँगना है
हमारी शोहरत माँगने से बनी है
औरों के लिए माँगकर
हम अपना काम चलाते हैं

हम जिनके लिए माँगते हैं
उनसे नहीं कहते
लड़ो मत
हम जानते हैं
वे लड़ नहीं सकते
और उन्हीं के लिए लिखी जा सकती हैं अर्जियाँ

हमने अभी आस नहीं छोड़ी है
चक्कर चला रहा हूँ
कि कुछ ऐसा, इतना बड़ा माँग लूँ
कि मरने तक
फिर मँगने की नौबत ही न आए

माँगते हुए
हमारा पूरा जीवन निकल गया
फिर भी यह समझ न आया
कि माँगते रहने से नहीं बनेगी बात

दुमका

दुमका मैं कभी न जा सका

मैं दुमका जाता
अगर मेरी बहिन वहाँ ब्याही गई होती

या जैसे कि मैं दिल्ली गया
पढ़ाई और नौकरी के लिए
मैं दुमका जाता
अगर दुमका दिल्ली होता

मैं अनुमान से जानता हूँ
दुमका हमारे शहर दरभंगा जैसा नहीं है
जहाँ मैं बार-बार लौटकर आ जाता हूँ

मेरे लिए यही कम नहीं
कि मैं जानता हूँ
दुमका जापान में नहीं है

मैं अभी मरा नहीं हूँ
मैं कुछ लोगों को जानता हूँ
जो दुमका को जानते हैं
वे कहते हैं
भरोसा कीजिए
दुमका को आपका इन्तज़ार है

दुमका के उन लोगों के बारे में मैं क्या कहँ
जो कभी दरभंगा नहीं आ सके

बहरहाल लाखों ऐसी चीज़ें हैं
जो दुमका और दरभंगा को जोड़ती हैं
जैसे हिन्दी का एक अक्षर
भूख और प्यास
कई गाने
जिनमें दुमका की शोहरत है
जो बजते हैं दरभंगा में

दिल्ली जैसा भले ही न हो दुमका
दिल्ली जैसा भले ही न हो दरभंगा
पर हमारे प्रधानमन्त्री
दुमका भी जाते हैं
दरभंगा भी आते हैं

सबसे अच्छा है सूरज
जो दुमका, दरभंगा
और दिल्ली में भी उगता है

मेरी अंतरात्मा में क्या है

मेरी अंतरात्मा में क्या है
कुछ ज़रूरी सिक्के
कुछ और सिक्कों के आने की उम्मीद
धनिकों का लोकतन्त्र
वंचितों का अमानवीय जीवन
धनिक बनने की मेरी अनिच्छा
एक खिन्न असन्तुष्ट आदमी
एक आसान मौत पाने की योजना
मालिक का एक बिगड़ा हुआ नौकर
नीचतापूर्ण तुच्छ कार्यों की निस्सारता से आहत
शोषितों के संघर्ष और पराजयों को
सुरक्षित दूरी से निहारता
एक बौना
एक कापुरूष
वंचितों के एक विराट विद्रोह की कामना
जो मेरी नकली उदारता, लघुता, पापबोध और अवसरवादिता से मुक्त कर दे
मैं बेचता रहता हूँ सस्ते में
अपनी अन्तरात्मा
जब सिक्के पूरे नहीं पड़ते
अनिच्छाएँ कवच हैं
मेरी अन्तरात्मा की
फल-फूल रही हैं
जिसमें मेरी शाश्वत निराशाएँ
और धनिकों का लोकन्त्र

मामूली सिपाही 

बेचारे मामूली सिपाही
सरकार की नाक कटवा देते हैं

उन्हें विधि-व्यस्था का ख़याल रखने से अधिक
ताश खेलने में मज़ा आता है

इश्क़बाज दिलफेंक सिपाही तो
डिपार्टमेण्ट के लिए शामत होते हैं
वे अनुशासन-प्रिय अफ़सर की नाक में दम कर देते हैं
जहाँ भेजो वहीं छुपकर शादी रचा लेते हैं

आधी रात ड्यूटी पर खर्राटे भरने वाले कामचोर
नशे में बार-बार सड़क पर गिर जाने वाले
बड़े ख़ानदान के छोटे सिपाहियों पर
दुनिया हँसती है

मगर ख़राब रिकॉर्ड वाले
अपने यही मिसफिट भोले-भाले सिपाही
जग-जाहिर करते हैं
कि दुनिया को सिपाहियों की ज़रूरत नहीं है
मिल-बैठ कर ताश खेलना डण्डा लेकर घूमने से अच्छा है
चोर को दौड़ाने से बेहतर है औरत को पटाना
तमगा पाने वाला नहीं
नशे में डोलता आदमी बोलता है
कि सिपाही का काम भी कोई काम है भला

सम्मानित

लिफ़्टमैन और दरबान जानते थे
वे रिक्शा चलाने वालों से कम कमाते हैं

वे कुछ पढ़े-लिखे थे
रिक्शा चलाने वालों की नियति पर
तरस खाते थे

वे तसल्ली से रहने की कोशिश करते
लिफ़्ट के पंखे की हवा खाते हुए
गाड़ियों का भोंपू सुनकर फाटक खोलते हुए

वे सोचते
वे रिक्शे पर बैठने वाले
सम्मानित लोगों में हैं

उन्हें पक्का यक़ीन था
रिक्शा-चालकों को
रिक्शे की सवारी का सौभाग्य
नसीब नहीं

उन्हें उम्मीद थी
उनका फेफड़ा देर से जवाब देगा

वे समझते थे
रिक्शा खींचने वालों के मुक़ाबले
भविष्य पर
ज़्यादा मज़बूत है उनकी पकड़

पर कुछ ऐसा था
जो न निगलते न उगलते बनता था
जब रिक्शावाले दाखिल होते थे
अपार्टमेण्ट के फाटक के अन्दर

बाढ़ के बाद 

असमय मर गए
ये एक जवान प्रवासी खेत-मज़दूर का
मिट्टी का घर है
जो ज़मीन पर पड़ा है

छप्पर सम्भालने वाला
लकड़ी का खम्भा
अब तक खड़ा है

पेड़ के नीचे बैठी
आसमान में उड़ते बादलों को निहारती
बेआवाज़ रोती हुई
प्रवासी मज़दूर की चिन्तामग्न बीवी
जिसकी छाती का सारा दूध सूख गया है
और गोद में बच्चा भूख से बिलबिला रहा है
जल्द से जल्द
घर खड़ा करने के बारे में सोच रही है

चौकी पर लोहे की एक पेटी है
जिस पर लाल गुलाब के छापे हैं

एक छाता है
जो बिना दिक़्क़त के खुल सकता है

शराब की छोटी बोतल है
जिसकी पेंदी में सरसों तेल की कुछ बून्दें हैं

खजूर की पत्तियों से बना एक डब्बा है
जिस पर फफून्द लगी है

स्टील के एक टूटे बर्तन में दो बैट्री हैं
जिसके अन्दर का रसायन बाहर आ रहा है

लकड़ी की एक बदरंग कुर्सी है
उसके नीचे अल्युमिनियम का एक बहुत पुराना बदना है

एक काला तवा है
पानी जिसका किनारा बुरी तरह खा चुका है

जीवनरक्षक दवाओं की कुछ टूटी बोतलें हैं
जो अपने मकसद में नाकाम रहीं

खम्भे से टँगा एक काले लोहे का कजरौटा है
कुछ फटे-पुराने कपड़ों के साथ रखा है एक टार्च
जिसका पीतल हरा हो रहा है

चमड़ा सड़ गया है
ढोलक नंगा हो गया है
पर वह बज रहा है
और उसमें आदमी को रुलाने की ताक़त बची हुई है

हम विकट गरीब-प्रेमी हैं

हम विकट गरीब-प्रेमी हैं
चाहे कोई सरकार बने
हम उसे ग़रीबों की सरकार मानकर
उसके सामने अपना प्रलाप शुरू कर देते हैं

ग़रीबों के बारे में
हम दृष्टि-दोष से पीड़ित हैं
उनका जिक्र आया नहीं
कि हम रोना शुरू कर देते हैं

ऐसी क्या बात है
कि सारे ग़रीब हमें मरीज़ ही दिखते हैं
लाचार, कर्ज़ में डूबे, कुपोषित, दर्द से चीख़ते,
चुपचाप मरते हुए

उछलते-कूदते, नाचते, शराब पीकर डोलते ग़रीब
हमें पसन्द क्यों नहीं हैं

बम फोड़ते, डाका डालते, आतंक मचाते गरीबों को
हम गरीब क्यों नहीं मानते

ग़रीब घेरते हुए
ग़रीब घिरते हुए
ग़रीब मुठभेड़ करते हुए
मरते-मारते हुए ग़रीब हमें सपनों में भी नहीं दिखते

ग़रीबों को
राज बनाते
मन्त्रालय चलाते देखना
हमारे वश में क्यों नहीं

हम बीमार ग़रीबों को
अस्पताल, बिस्तर और मुफ़्त दवा से ज़्यादा
कुछ और क्यों नहीं देना चाहते

हम उन्हें साक्षर हट्टे-कट्टे मज़दूरों से ज़्यादा
किसी और रूप में क्यों नहीं देख पाते

मुझे उम्मीद है दोस्तों आपको अमिताभ बच्चन की कविताएं - Amitabh Bachchan poems in hindi पसंद आयी होंगी।

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